बकरीद पर जानवरों की बलि देने के पीछे क्या कारण है?

बकरीद पर जानवरों की बली देने के पीछे है ये महत्वपूर्ण कारण

इस्लाम में मुख्य तौर पर सिर्फ 2 त्यौहार मनाए जाते है एक ईद-उल-अजहा और दूसरा ईद-उल-फ़ित्र. आज यानि की 2 सितम्बर को ईद-उल-अजहा मनाई जा रही है. ईद-उल-फ़ित्र में तो मीठी सेंवईया खाई जाती है लेकिन आज की ईद में नमाज़ अदा करने के साथ ही जानवरों की बलि दी जाती है और उसे खाया जाता है. इस्लाम के अनुसार कुर्बानी करना हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की सुन्नत है, जिसे अल्लाह ने मुसलमानों पर वाजिब करार दिया है.

जानवरों की कुर्बानी का सिलसिला ईद से लेकर तीन दिनों तक जारी रहता है. अल्लाह की रजा के लिए मुस्लिम समाज कुर्बानी करता है, हलाल की कमाई से की हुई कुर्बानी को जायज माना जाता है, हराम से की गई कमाई से कुर्बानी को नही.

कुर्बानी का इस्लामिक महत्व

मुफ़्ती एजाज अरशद कासमी का मानना है की इस्लाम में कुर्बानी का बहुत महत्व है. इस्लाम के अनुसार अल्लाह ने हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम को अपनी सबसे प्यारी चीज़ कुर्बान करने का आदेश दिया था. हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम को 80 वर्ष की उम्र में औलाद का सुख प्राप्त हुआ था. इसलिए उनके लिए उनके बेटे हजरत ईस्माइल अलैहिस्सलाम सबसे प्यारे थे. ये इब्राहिम अलैहिस्सलाम के लिए परीक्षा की घडी थी. एक तरफ अल्लाह का हुक्म था और दूसरी और उनके लाडले बेटे लेकिन इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के हुक्म अनुसार अपने बेटे ईस्माइल अलैहिस्सलाम की कुर्बानी देने की ठानी थी.

अपने बेटे की बलि देते समय इब्राहिम की भावनाएं उनके आड़े ना आए इसलिए उन्होंने कुर्बानी देने से पहले अपनी आँखों पर पट्टी बांध ली थी. इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने जैसे ही ईस्माइल अलैहिस्सलाम की गर्दन काटने के लिए छुरी चलाई तो अल्लाह के हुक्म से ईस्माइल की जगह एक दुम्बा (एक जानवर) हाजिर हो गया. जब इब्राहिम ने अपने आँखों से पट्टी उतारी तो अपने बेटे को जीवित पाया. अल्लाह को ये अदा पसंद आई और उन्होंने साहिबे हैसियत पर कुर्बानी करना वाजिब कर दिया. अगर साहिबे हैसियत होते हुए भी किसी शख्स ने कुर्बानी नही दी तो वो गुनहगार माना जाता है. कुर्बानी के लिए जरुरी नही है की जानवर महंगे या सस्ते हो.

किस पर कुर्बानी वाजिब

इस्लाम धर्म के अनुसार वह इंसान साहिबे हैसियत है जिसके पास साढ़े सात तोला सोना या साढ़े 52 तोला चांदी है या उसके हिसाब से पैसे. आज के हिसाब से बात करे तो अगर आपके पास 28 से 30 हजार रुपए है तो आप साढ़े 52 किलो चांदी वाले दायरे में है. इसलिए जिसके पास 30 हजार रुपए है उसके लिए कुर्बानी देना वाजिब और जरुरी बन जाता है

कुर्बानी का मकसद क्या है?

मुफ़्ती कासमी के मुताबिक इस्लाम में जानवरों की कुर्बानी के पीछे एक खास मकसद है. अल्लाह लोगो के दिलो से वाकिफ है, ऐसे में अल्लाह हर सख्स की नीयत को समझता है. जब बंदा अल्लाह का हुक्म मानकर रजा के लिए कुर्बानी देता है तो उसे अल्लाह की रजा मिलती है. और अगर सख्स ने कुर्बानी सिर्फ दिखावे के लिए की है तो अल्लाह उस कुर्बानी को क़ुबूल नही करता है.

कुर्बानी के तीन हिस्से होते है

कुर्बानी के लिए भी जानवरों को तीन अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया है. बड़े जानवर जैसे की भैस या ऊंट की कुर्बानी पर सात हिस्से होते है मतलब उसमे सात लोगो को शामिल किया जा सकता है और बकरे जैसे छोटे जानवरों के लिए एक हिस्सा.

शरीयत में कुर्बानी के गोश्त को तीन हिस्सों में बांटने का कहा गया है एक हिस्सा गरीबो के नाम, दूसरा हिस्सा अपने दोस्तों के नाम और तीसरा हिस्सा अपने घर के लिए बचाया जाता है. गरीबो को हिस्सा देना इस्लाम में फायदेमंद माना जाता है.

प्रतिबंधित जानवरों की कुर्बानी न दे

मुफ़्ती अरशद कासमी के बताए अनुसार ऐसे ही जानवरों की कुर्बानी दे जिसकी कानून हमे इजाजत देता है. सरकार द्वारा प्रतिबंधित जानवरों की कुर्बानी कतई न दे.

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